ग़ज़ल
अपना ना समझे जो , क्या वो गिला समझे ।
यूं तो दिल समझे सब, यही बात ना समझे ।
दिल को खुश रखने के, बहाने हजारों हैं,
लेकिन है पागल ये, कि ग़म को ख़ुदा समझे।
रंगों में,हर्फ़ों में,सुरों में, तरानों में,
ए दिल कोई समझे, हमॆं फिर क्या समझे ?
यूं तो कुछ कुछ हम भी, वफ़ा से नहीं वाकिफ़,
ये ना है , कोई बेवफ़ा बेवफ़ा समझे !
शरमाकर सिमटे वो, खुदी की शरारत पर,
मंजर ही समझे हम, क्या था ! खुदा समझे |
किसको कह दें हम ये, कि "चौहान": है कातिल,
बातों से मारे वो, कोई फिर क्या समझे ।
"चौहान"
अपना ना समझे जो , क्या वो गिला समझे ।
यूं तो दिल समझे सब, यही बात ना समझे ।
दिल को खुश रखने के, बहाने हजारों हैं,
लेकिन है पागल ये, कि ग़म को ख़ुदा समझे।
रंगों में,हर्फ़ों में,सुरों में, तरानों में,
ए दिल कोई समझे, हमॆं फिर क्या समझे ?
यूं तो कुछ कुछ हम भी, वफ़ा से नहीं वाकिफ़,
ये ना है , कोई बेवफ़ा बेवफ़ा समझे !
शरमाकर सिमटे वो, खुदी की शरारत पर,
मंजर ही समझे हम, क्या था ! खुदा समझे |
किसको कह दें हम ये, कि "चौहान": है कातिल,
बातों से मारे वो, कोई फिर क्या समझे ।
"चौहान"

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