ग़ज़ल
ये हमारा जीवना भी बेमिसाल होता ।
आप मिलते जो हमे तो बाकमाल होता ।
आरज़ू थी आरज़ू को अब क्या कहूं मैं,
इक ग़ज़ल लिखता अगर ख्याल होता ।
रंग मिलता ना मोहब्बत का जबां’ को, तो मैं,
बादशाह होता मगर फिर भी कंगाल होता ।
पोछ देता आंख से बहती नदी ग़मो की,
मैं अगर इंसान ना होता रूमाल होता ।
वो हजारों तू अकेला एक जान "चौहान"
आज दिल भी साथ होता तो धमाल होता ।
"चौहान"
ये हमारा जीवना भी बेमिसाल होता ।
आप मिलते जो हमे तो बाकमाल होता ।
आरज़ू थी आरज़ू को अब क्या कहूं मैं,
इक ग़ज़ल लिखता अगर ख्याल होता ।
रंग मिलता ना मोहब्बत का जबां’ को, तो मैं,
बादशाह होता मगर फिर भी कंगाल होता ।
पोछ देता आंख से बहती नदी ग़मो की,
मैं अगर इंसान ना होता रूमाल होता ।
वो हजारों तू अकेला एक जान "चौहान"
आज दिल भी साथ होता तो धमाल होता ।
"चौहान"

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